مُقَدّمَة मुक़दमा
١) عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: إِنَّمَا الْأَعْمَال بِالنِّيَّاتِ وَإِنَّمَا لكل امْرِئ مَا نَوَى فَمَنْ كَانَتْ هِجْرَتُهُ إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ فَهِجْرَتُهُ إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَنْ كَانَتْ هِجْرَتُهُ إِلَى دُنْيَا يُصِيبُهَا أَوِ امْرَأَةٍ يَتَزَوَّجُهَا فَهجرَته إِلَى مَا هَاجر إِلَيْهِ
[1] उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहू
अन्हु बयान करते हैं, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “तमाम आमाल
का दारोमदार नियतो पर है, हर शख़्स को वही कुछ मिलेगा जो उसने नियत की है, तो
जिस शख़्स की हिजरत अल्लाह और उसके रसूल के लिए हुई तो उसकी हिजरत अल्लाह और उसके
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए है और जिसकी हिजरत दुनिया कमाने या किसी औरत
से शादी करने के लिए हुई तो उसकी हिजरत उसके लिए है जिसके लिए उसने हिजरत की”।
तख़रीज: मुत्तफ़िक़ अलैह, बुख़ारी (1,54,2529,3898,5070,6689,6953), मुस्लिम (4927)।
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