Hadees in hindi

Monday, October 28, 2019

1 الطَّهَارَةِ عَنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ किताब : तहारत के अहकाम ओ मसाइल

بَابُ مَا جَاءَ أَنَّ مِفْتَاحَ الصَّلَاةِ الطُّهُورُ
बाब 3: वुज़ू नमाज़ की कुंजी है 

٣) حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ، وَهَنَّادٌ، وَمَحْمُودُ بْنُ غَيْلَانَ، قَالُوا: حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ سُفْيَانَ، ح وحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ قَالَ: حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ قَالَ: حَدَّثَنَا [ص:9] سُفْيَانُ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَقِيلٍ، عَنْ مُحَمَّدِ ابْنِ الْحَنَفِيَّةِ، عَنْ عَلِيٍّ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: «مِفْتَاحُ الصَّلَاةِ الطُّهُورُ، وَتَحْرِيمُهَا التَّكْبِيرُ، وَتَحْلِيلُهَا التَّسْلِيمُ». هَذَا الْحَدِيثُ أَصَحُّ شَيْءٍ فِي هَذَا الْبَابِ وَأَحْسَنُ. وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ عَقِيلٍ هُوَ صَدُوقٌ، وَقَدْ تَكَلَّمَ فِيهِ بَعْضُ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ قِبَلِ حِفْظِهِ. وسَمِعْت مُحَمَّدَ بْنَ إِسْمَاعِيلَ، يَقُولُ: كَانَ أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَإِسْحَاقُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، وَالْحُمَيْدِيُّ، يَحْتَجُّونَ بِحَدِيثِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَقِيلٍ، قَالَ مُحَمَّدٌ: وَهُوَ مُقَارِبُ الْحَدِيثِ. وَفِي الْبَابِ عَنْ جَابِرٍ، وَأَبِي سَعِيدٍ


3) अली रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “नमाज़ की कुंजी वुज़ू है और उसकी तहरीम अल्लाहु अकबर कहना है (यानी अल्लाहु अकबर कह कर नमाज़ में दाख़िल होने से वह सारे काम हराम होते हैं जिन्हें अल्लाह ने नमाज़ में हराम किया है) और नमाज़ में जो चीज़ें हराम थीं, वह अस्सलामु अलैकुम (सलाम फेरने से) कहने ही से हलाल होती हैं l”
इमाम तिरमिज़ कहते हैं: इस बाब में यह हदीस सबसे सहीह और हसन है l अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन अक़ील सुदूक़ हैं, बाज़ अहले इल्म ने उनके हाफ़िज़े के बारे में उन पर कलाम किया है, मैंने मुहम्मद बिन इस्माईल बुख़ारी को यह कहते हुए सुना कि अहमद बिन हम्बल, इसहाक़ बिन इब्राहीम और हुमैदी: अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन अक़ील की रिवायत से हुज्जत पकड़ते थे और वह मक़ारबुल हदीस (इसका मतलब दूसरों की हदीस इसकी हदीस से क़रीब है) हैं l इस बाब में जाबिर और अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहू अन्हुमा से भी हदीसें आई हैं l
तहकीम :
ज़ुबैर अली ज़ई:- हसन
शेख़ अलबानी:- हसन सहीह  
शुऐब अरनऊत :- सहीह लिग़ेरिह
तख़रीज : सुनन अबू दावूद (61), इब्ने माजा (275)

Sunday, October 27, 2019

1 - كِتَاب الطَّهَارَةِ तहारत के अहकाम ओ मसाइल


بَابُ مَا يَقُولُ الرَّجُلُ إِذَا دَخَلَ الْخَلَاءَ
बाब 3: आदमी बैतुल ख़ला में जाना चाहे तो क्या पढ़े ?

٤) حَدَّثَنَا مُسَدَّدُ بْنُ مُسَرْهَدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، وَعَبْدُ الْوَارِثِ، عَنْ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ صُهَيْبٍ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا دَخَلَ الْخَلَاءَ قَالَ: عَنْ حَمَّادٍ قَالَ: «اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ» وَقَالَ: عَنْ عَبْدِ الْوَارِثِ قَالَ: «أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ»

قَالَ أَبُو دَاوُدَ: رَوَاهُ شُعْبَةُ، عَنْ عَبْدِ الْعَزِيزِ: " اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ "، وَقَالَ مَرَّةً: " أَعُوذُ بِاللَّهِ "، وَقَالَ وُهَيْبٌ: " فَلْيَتَعَوَّذْ بِاللَّهِ ".


4) हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहू अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब बैतुल ख़ला में जाने का इरादा करते तो यह दुआ पढ़ते... हम्माद बिन ज़ैद के अल्फ़ाज़ हैं: [اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ] और अब्दुल वारिस के अल्फ़ाज़ हैं: [أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ] “ऐ अल्लाह! मैं ख़बीस जिन्नों और जिन्नियों से तेरी पनाह में आता हूँl” इमाम अबू दावूद रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि शोबा अब्दुल अज़ीज़ से [اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ...] के अल्फ़ाज़ कहें हैं जबकि उन्होंने एक बार [أَعُوذُ بِاللَّهِ...] के अल्फ़ाज़ भी बयान किये l
इमाम अबू दावूद कहते हैं कि वुहैब से [فَلْيَتَعَوَّذْ بِاللَّهِ] “उसे अल्लाह की पनाह लेनी चाहिए l” के अल्फ़ाज़ कहें हैं l

तख़रीज : सही बुख़ारी (142), सही मुस्लिम (831), सुनन नसाई (19), सुनन तिरमिज़ी (6), इब्ने माजा (298)

Saturday, October 26, 2019

1 - كِتَابُ الْإِيمَانَ ईमान के अहकाम व मसाइल

الإسلام مَا هُوَ وَبَيَانُ خِصَالِهِ

इस्लाम की हक़ीक़त और उसकी ख़ूबियाँ


٩٩) حَدَّثَنِي زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ عُمَارَةَ وَهُوَ ابْنُ الْقَعْقَاعِ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «سَلُونِي»، فَهَابُوهُ أَنْ يَسْأَلُوهُ، فَجَاءَ رَجُلٌ، فَجَلَسَ عِنْدَ رُكْبَتَيْهِ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِسْلَامُ؟ قَالَ: «لَا تُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا، وَتُقِيمُ الصَّلَاةَ، وَتُؤْتِي الزَّكَاةَ، وَتَصُومُ رَمَضَانَ»، قَالَ: صَدَقْتَ، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِيمَانُ؟ قَالَ: «أَنْ تُؤْمِنَ بِاللهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكِتَابِهِ، وَلِقَائِهِ، وَرُسُلِهِ، وَتُؤْمِنَ بِالْبَعْثِ، وَتُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ كُلِّهِ»، قَالَ: صَدَقْتَ، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِحْسَانُ؟ قَالَ: «أَنْ تَخْشَى اللهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ، فَإِنَّكَ إِنْ لَا تَكُنْ تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ»، قَالَ: صَدَقْتَ. قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَتَى تَقُومُ السَّاعَةُ؟ قَالَ: " مَا الْمَسْئُولُ عَنْهَا بِأَعْلَمَ مِنَ السَّائِلِ، وَسَأُحَدِّثُكَ عَنْ أَشْرَاطِهَا: إِذَا رَأَيْتَ الْمَرْأَةَ تَلِدُ رَبَّهَا، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا، وَإِذَا رَأَيْتَ الْحُفَاةَ الْعُرَاةَ الصُّمَّ الْبُكْمَ مُلُوكَ الْأَرْضِ، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا، وَإِذَا رَأَيْتَ رِعَاءَ الْبَهْمِ يَتَطَاوَلُونَ فِي الْبُنْيَانِ، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا فِي خَمْسٍ مِنَ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهُنَّ إِلَّا اللهُ "، ثُمَّ قَرَأَ: {إِنَّ اللهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللهِ عَلِيمٌ خَبِيرٌ} [لقمان: 34] قَالَ: ثُمَّ قَامَ الرَّجُلُ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «رُدُّوهُ عَلَيَّ»، فَالْتُمِسَ، فَلَمْ يَجِدُوهُ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «هَذَا جِبْرِيلُ، أَرَادَ أَنْ تَعَلَّمُوا إِذْ لَمْ تَسْأَلُوا»


99) हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “मुझसे (दीन के बारे में) पूछ लो l” सहाबा किराम आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हैबत की वजह से पूछ न सके, तब एक आदमी आया और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दोनों घुटनों के क़रीब बैठ गया, फिर कहने लगा: ऐ अल्लाह के रसूल! इस्लाम क्या है? आपने फ़रमाया: “तुम अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक न करो, नमाज़ क़ायम करो, ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखो l” उसने कहा: आपने सच कहा l फिर पुछा: ऐ अल्लाह के रसूल! ईमान क्या है? आपने फ़रमाया: “यह कि तुम अल्लाह तआला, उसके फ़रिशतों, उसकी किताब, (क़यामत के दिन) उससे मुलाक़ात और उसके रसूलों पर ईमान लाओ, मरने के बाद उठने पर ईमान लाओ और तक़दीर पर ईमान लाओ l” उसने कहा: आपने सच कहा l फिर कहने लगा: ऐ अल्लाह के रसूल! इहसान क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “तुम अल्लाह तआला से इस तरह डरो जैसे तुम उसे देख रहे हो और अगर तुम उसे नहीं देख रहे हो तो वह यक़ीनन तुम्हें देख रहा है l” उसने कहा: आपने सच कहा, फिर पुछा: ऐ अल्लाह के रसूल! क़यामत कब होगी? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जिससे क़यामत के बारे में सवाल किया गया है, वह इसके बारे में पूछने वाले से ज़्यादा नहीं जानता, लेकिन मैं तुम्हें क़यामत की निशानियाँ बता देता हूँ: जब औरत अपना मालिक जनेगी तो यह उसकी निशानियों में से है, जब नंगे पैर वाले और नंगे बदन, गूंगे और बहरे ज़मीन के बादशाह हैं तो यह उसकी निशानियों में से है और जब भेड़ बकरियां चराने वाले, ऊंचीं ऊंचीं इमारतें बनाने में एक दुसरे से मुक़ाबला करेंगें तो यह उसकी निशानियों में से है, यह (क़यामत के वक़्त का इल्म) ग़ैब की उन पांच चीज़ों में से है जिन्हें अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता l” फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह आयत पढ़ी: “बेशक अल्लाह तआला ही के पास क़यामत का इल्म है, वही बारिश बरसाता है और वही जानता है कि माओं के पेटों में क्या है, कोई जान नहीं जानती कि वह कल क्या करेगी, न किसी नफ़्स को यह मालूम है कि वह ज़मीन के किस हिस्से में मरेग......l” सूरत के आख़िर तक (हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु ने) कहा: फिर वह आदमी वापस चला गया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “उस आदमी को मेरे पास वापस लाओ l” सहाबा किराम उसे वापस लाने के लिए भाग दौड़ करने लगे तो उन्हें कुछ नज़र न आया, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “यह जिब्रील अलैहिस्सलाम थे जो लोगों को उनका दीन सिखाने आये थे l”

तख़रीज : सही बुख़ारी (50), सुनन अबू दावूद (4698), सुनन नसाई (4994), इब्ने माजा (64)

Sunday, October 20, 2019

1 كتاب السنة सुन्नत की अहमियत और फ़ज़ीलत

بَابُ اتِّبَاعِ سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

बाब 1 :- सुन्नते रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैरवी का बयान


٣) حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ قَالَ: حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، وَوَكِيعٌ، عَنِ الْأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ أَطَاعَنِي فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ، وَمَنْ عَصَانِي فَقَدْ عَصَى اللَّهَ»

3) हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जिसने मेरी इताआत की उसने अल्लाह की इताआत की और जिसने मेरी नाफ़रमानी की उसने अल्लाह की नाफ़रमानी की l”

तख़रीज : सही बुख़ारी (7137), सही मुस्लिम (4747),  सुनन नसाई (4198)

Thursday, October 17, 2019

1 - كِتَاب الطَّهَارَةِ तहारत के अहकाम ओ मसाइल

بَابُ الرَّجُلِ يَتَبَوَّأُ لِبَوْلِهِ
बाब 2: पेशाब के लिए (नरम) जगह तलाश करना

٣) حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا أَبُو التَّيَّاحِ، قَالَ: حَدَّثَنِي شَيْخٌ، قَالَ لَمَّا قَدِمَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبَّاسٍ الْبَصْرَةَ، فَكَانَ يُحَدِّثُ عَنْ أَبِي مُوسَى، فَكَتَبَ عَبْدُ اللَّهِ إِلَى أَبِي مُوسَى يَسْأَلُهُ عَنْ أَشْيَاءَ، فَكَتَبَ إِلَيْهِ أَبُو مُوسَى: إِنِّي كُنْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ذَاتَ يَوْمٍ فَأَرَادَ أَنْ يَبُولَ، فَأَتَى دَمِثًا فِي أَصْلِ جِدَارٍ فَبَالَ، ثُمَّ قَالَ: صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ «إِذَا أَرَادَ أَحَدُكُمْ أَنْ يَبُولَ فَلْيَرْتَدْ لِبَوْلِهِ مَوْضِعًا»


3) अबू तय्याह कहते हैं कि मुझे एक शेख़ ने बताया कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा जब बसरा में (गवर्नर की हैसियत से) तशरीफ़ लाये तो लोग उन्हें हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहू अन्हु से सुनी हुई हदीसें बयान करते थे....(तो इस बारे में) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा ने हज़रत अबू मूसा रज़ियल्लाहू के नाम एक ख़त लिखा जिसमें उनसे कुछ मसाइल पूछे तो हज़रत अबू मूसा रज़ियल्लाहू अन्हु ने उन्हें जवाब में लिखा: मैं एक दिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ था, तो आपने पेशाब करने का इरादा किया, तो आप एक दीवार की जड़ में नरम मिट्टी के पास आये और पेशाब किया l इसके बाद आपने फ़रमाया: “तुममें से जब कोई पेशाब करना चाहे तो उसके लिए (मुनासिब नरम) जगह तलाश कर लिया करे l”
तह्कीम : ज़ुबैर अली ज़ई:- ज़ईफ़
        शेख़ अलबानी:- ज़ईफ़
        शोएब अरनऊत:- ज़ईफ़

1 - كِتَابُ الْإِيمَانَ ईमान के अहकाम व मसाइल


الْإِيمَانُ مَا هُوَ وَبَيَانُ خِصَالِهِ

ईमान क्या है? और उसकी ख़सलतों का बयान 


٩٧) وحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَزُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، جَمِيعًا عَنِ ابْنِ عُلَيَّةَ، قَالَ زُهَيْرٌ: حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ أَبِي حَيَّانَ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ بْنِ عَمْرِو بْنِ جَرِيرٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَوْمًا بَارِزًا لِلنَّاسِ، فَأَتَاهُ رَجُلٌ، فَقَالَ: يَا رَسُولُ اللهِ، مَا الْإِيمَانُ؟ قَالَ: «أَنْ تُؤْمِنَ بِاللهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكِتَابِهِ، وَلِقَائِهِ، وَرُسُلِهِ، وَتُؤْمِنَ بِالْبَعْثِ الْآخِرِ»، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِسْلَامُ؟ قَالَ: «الْإِسْلَامُ أَنْ تَعْبُدَ اللهَ، وَلَا تُشْرِكَ بِهِ شَيْئًا، وَتُقِيمَ الصَّلَاةَ الْمَكْتُوبَةَ، وَتُؤَدِّيَ الزَّكَاةَ الْمَفْرُوضَةَ، وَتَصُومَ رَمَضَانَ» قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِحْسَانُ؟ قَالَ: «أَنْ تَعْبُدَ اللهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ، فَإِنَّكَ إِنْ لَا تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ»، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهَ، مَتَى السَّاعَةُ؟ قَالَ: " مَا الْمَسْئُولُ عَنْهَا بِأَعْلَمَ مِنَ السَّائِلِ، وَلَكِنْ سَأُحَدِّثُكَ عَنْ أَشْرَاطِهَا: إِذَا وَلَدَتِ الْأَمَةُ رَبَّهَا، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا، وَإِذَا كَانَتِ الْعُرَاةُ الْحُفَاةُ رُءُوسَ النَّاسِ، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا، وَإِذَا تَطَاوَلَ رِعَاءُ الْبَهْمِ فِي الْبُنْيَانِ، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا فِي خَمْسٍ لَا يَعْلَمُهُنَّ إِلَّا اللهُ، ثُمَّ تَلَا صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: {إِنَّ اللهِ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ} [لقمان: 34] " قَالَ: ثُمَّ أَدْبَرَ الرَّجُلُ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «رُدُّوا عَلَيَّ الرَّجُلَ»، فَأَخَذُوا لِيَرُدُّوهُ، فَلَمْ يَرَوْا شَيْئًا، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «هَذَا جِبْرِيلُ جَاءَ لِيُعَلِّمَ النَّاسَ دِينَهُمْ»


97) हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक दिन लोगों के सामने बैठे थे, एक आदमी आपके पास आया और पुछा: ऐ अल्लाह के रसूल! ईमान क्या है? आपने फ़रमाया: “तुम अल्लाह तआला, उसके फ़रिशतों, उसकी किताब, (क़यामत के दिन) उससे मुलाक़ात और उसके रसूलों पर ईमान आओ और आख़िरी (बार जिंदा होकर) उठने पर (भी) ईमान ले आओ l” उसने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! इस्लाम क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “इस्लाम यह है कि अल्लाह तआला की इबादत करो और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराओ, फ़र्ज़ नमाज़ की पाबन्दी करो, फ़र्ज़ की गई ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखोl” उसने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! इहसान क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला की इबादत इस तरह करो जैसे तुम देख रहे हो और अगर तुम उसे नहीं देख रहे हो तो वह यक़ीनन तुम्हें देख रहा है l” उसने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! क़यामत कब होगी? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जिससे सवाल किया गया है, वह इसके बारे में पूछने वाले से ज़्यादा नहीं जानता, लेकिन मैं तुम्हें क़यामत की निशानियाँ बता देता हूँ: जब लौंडी अपना मालिक जनेगी तो यह उसकी निशानियों में से है, और जब नंगे बदन और नंगे पैर वाले लोगों के सरदार बन जायेंगे तो यह उसकी निशानियों में से है और जब भेड़ बकरियां चराने वाले, ऊंचीं ऊंचीं इमारतें बनाने में एक दुसरे से मुक़ाबला करेंगें तो यह उसकी निशानियों में से है, (क़यामत के वक़्त का इल्म) उन पांच चीज़ों में से है जिन्हें अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता l” फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह आयत पढ़ी: “बेशक अल्लाह तआला ही के पास क़यामत का इल्म है, वही बारिश बरसाता है और वही जानता है कि माओं के पेटों में क्या है, कोई जान नहीं जानती कि वह कल क्या करेगी, न किसी नफ़्स को यह मालूम है कि वह ज़मीन के किस हिस्से में मरेगा, यक़ीनन अल्लाह तआला इल्म वाला ख़बरदार है l” (हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु ने) कहा: फिर वह आदमी वापस चला गया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “उस आदमी को मेरे पास वापस लाओ l” सहाबा किराम उसे वापस लाने के लिए भाग दौड़ करने लगे तो उन्हें कुछ नज़र न आया, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “यह जिब्रील अलैहिस्सलाम थे जो लोगों को उनका दीन सिखाने आये थे l”

तख़रीज : सही बुख़ारी (50), सुनन अबू दावूद (4698), सुनन नसाई (4994), इब्ने माजा (64)

٩٨) حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ، حَدَّثَنَا أَبُو حَيَّانَ التَّيْمِيُّ، بِهَذَا الْإِسْنَادِ مِثْلَهُ، غَيْرَ أَنَّ فِي رِوَايَتِهِ: «إِذَا وَلَدَتِ الْأَمَةُ بَعْلَهَا» يَعْنِي السَّرَارِيَّ


98) (इब्ने उलय्या के बजाये) मुहम्मद बिन बशर ने कहा: हमें अबू हय्यान ने पिछली सनद से वही हदीस बयान की, लकिन उनकी रिवायत में: «إِذَا وَلَدَتِ الْأَمَةُ بَعْلَهَا» “जब लौंडी अपना मालिक जनेगीl”

तख़रीज : सही बुख़ारी (50), सुनन अबू दावूद (4698), सुनन नसाई (4994), इब्ने माजा (64)

1 كِتَابُ الطَّهَارَةِ तहारत के अहकाम ओ मसाइल

بَابُ كَيْفَ يَسْتَاكُ

बाब 3 : मिस्वाक कैसे करे?


 ٣) أَخْبَرَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ قَالَ: حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ قَالَ: أَخْبَرَنَا غَيْلَانُ بْنُ جَرِيرٍ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ: " دَخَلْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ يَسْتَنُّ وَطَرَفُ السِّوَاكِ عَلَى لِسَانِهِ وَهُوَ يَقُولُ: عَأْ عَأْ "


3) हज़रत अबू मूसा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास गया तो आप दांत साफ़ कर रहे थे और मिस्वाक का सिरा आपकी ज़बान मुबारक पर था और आप आ आ कर रहे थे l

तख़रीज : सही बुख़ारी (244), सही मुस्लिम (592), सुनन अबू दावूद (49)

Monday, October 14, 2019

1 كتاب السنة सुन्नत की अहमियत और फ़ज़ीलत

بَابُ اتِّبَاعِ سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

बाब 1 :- सुन्नते रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैरवी का बयान

٢) حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، قَالَ: أَخْبَرَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الْأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: ذَرُونِي مَا تَرَكْتُكُمْ، فَإِنَّمَا هَلَكَ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ بِسُؤَالِهِمْ وَاخْتِلَافِهِمْ عَلَى أَنْبِيَائِهِمْ، فَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ فَخُذُوا مِنْهُ مَا اسْتَطَعْتُمْ، وَإِذَا نَهَيْتُكُمْ عَنْ شَيْءٍ فَانْتَهُوا

2) हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जब तक मैं तुम्हें (किसी मामले में आज़ाद) छोड़े रखूँ, तब तक तुम भी मुझे छोड़े रखो (बिना ज़रुरत सवाल न करो) क्यूंकि तुमसे पहले लोग अपने नबियों से सवालात करने और (फिर) उनके (अहकाम) की मुख़ालिफ़त करने की वजह से हलाक हुए, लिहाज़ा जब में तुम्हें किसी काम का हुक्म दूं तो अपनी हिम्मत के मुताबिक़ इसको करो और जब किसी काम से मना कर दूं तो इससे रुक जाओ l”

तख़रीज : सही बुख़ारी (7288), सही मुस्लिम (3257), तिरमिज़ी (2679)

Sunday, October 13, 2019

1 - كِتَاب الطَّهَارَةِ तहारत के अहकाम ओ मसाइल

بَابُ التَّخَلِّي عِنْدَ قَضَاءِ الْحَاجَةِ

बाब 1 : क़ज़ा ए हाजत (पेशाब, पाखाना) के लिए लोगो से अलग और दूर होने का बयान


٢) حَدَّثَنَا مُسَدَّدُ بْنُ مُسَرْهَدٍ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، أَخْبَرَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، «أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ إِذَا أَرَادَ الْبَرَازَ انْطَلَقَ، حَتَّى لَا يَرَاهُ أَحَدٌ»

2) हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहू अन्हुमा बयान करते हैं: नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब पेशाब, पखाने की हाजत होती तो (आबादी से) दूर चले जाते यहाँ तक कि आपको कोई न देख सकता l

तख़रीज : इब्ने माजा (335)
तह्कीम :     ज़ुबैर अली ज़ई:- ज़ईफ़
        अलबानी:- सहीह
        शोएब:- सहीह लिग़ेरिह


1- بَدْءِ الوَحْيِ वही की शुरुआत का बयान

كَيْفَ كَانَ بَدْءُ الوَحْيِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟ وَقَوْلُ اللَّهِ جَلَّ ذِكْرُهُ: {إِنَّا أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ كَمَا أَوْحَيْنَا إِلَى نُوحٍ وَالنَّبِيِّينَ مِنْ بَعْدِهِ} [النساء: 163]

बाब 1: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर वही की शुरआत कैसे हुई? अल्लाह तआला के फ़रमान (की वज़ाहत) : "हमने आपकी तरफ़ उसी तरह वही नाज़िल फ़रमाई है जैसे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनके बाद आने वाले सारे नबियों की तरफ़ नाज़िल की थी"


٣) حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ بُكَيْرٍ، قَالَ: حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ عُقَيْلٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنِينَ أَنَّهَا قَالَتْ: أَوَّلُ مَا بُدِئَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنَ الوَحْيِ الرُّؤْيَا الصَّالِحَةُ فِي النَّوْمِ، فَكَانَ لاَ يَرَى رُؤْيَا إِلَّا جَاءَتْ مِثْلَ فَلَقِ الصُّبْحِ، ثُمَّ حُبِّبَ إِلَيْهِ الخَلاَءُ، وَكَانَ يَخْلُو بِغَارِ حِرَاءٍ فَيَتَحَنَّثُ فِيهِ - وَهُوَ التَّعَبُّدُ - اللَّيَالِيَ ذَوَاتِ العَدَدِ قَبْلَ أَنْ يَنْزِعَ إِلَى أَهْلِهِ، وَيَتَزَوَّدُ لِذَلِكَ، ثُمَّ يَرْجِعُ إِلَى خَدِيجَةَ فَيَتَزَوَّدُ لِمِثْلِهَا، حَتَّى جَاءَهُ الحَقُّ وَهُوَ فِي غَارِ حِرَاءٍ، فَجَاءَهُ المَلَكُ فَقَالَ: اقْرَأْ، قَالَ: «مَا أَنَا بِقَارِئٍ»، قَالَ: " فَأَخَذَنِي فَغَطَّنِي حَتَّى بَلَغَ مِنِّي الجَهْدَ ثُمَّ أَرْسَلَنِي، فَقَالَ: اقْرَأْ، قُلْتُ: مَا أَنَا بِقَارِئٍ، فَأَخَذَنِي فَغَطَّنِي الثَّانِيَةَ حَتَّى بَلَغَ مِنِّي الجَهْدَ ثُمَّ أَرْسَلَنِي، فَقَالَ: اقْرَأْ، فَقُلْتُ: مَا أَنَا بِقَارِئٍ، فَأَخَذَنِي فَغَطَّنِي الثَّالِثَةَ ثُمَّ أَرْسَلَنِي، فَقَالَ: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ. خَلَقَ الإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ. اقْرَأْ وَرَبُّكَ الأَكْرَمُ} [العلق: 2] " فَرَجَعَ بِهَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَرْجُفُ فُؤَادُهُ، فَدَخَلَ عَلَى خَدِيجَةَ بِنْتِ خُوَيْلِدٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، فَقَالَ: «زَمِّلُونِي زَمِّلُونِي» فَزَمَّلُوهُ حَتَّى ذَهَبَ عَنْهُ الرَّوْعُ، فَقَالَ لِخَدِيجَةَ وَأَخْبَرَهَا الخَبَرَ: «لَقَدْ خَشِيتُ عَلَى نَفْسِي» فَقَالَتْ خَدِيجَةُ: كَلَّا وَاللَّهِ مَا يُخْزِيكَ اللَّهُ أَبَدًا، إِنَّكَ لَتَصِلُ الرَّحِمَ، وَتَحْمِلُ الكَلَّ، وَتَكْسِبُ المَعْدُومَ، وَتَقْرِي الضَّيْفَ، وَتُعِينُ عَلَى نَوَائِبِ الحَقِّ، فَانْطَلَقَتْ بِهِ خَدِيجَةُ حَتَّى أَتَتْ بِهِ وَرَقَةَ بْنَ نَوْفَلِ بْنِ أَسَدِ بْنِ عَبْدِ العُزَّى ابْنَ عَمِّ خَدِيجَةَ وَكَانَ امْرَأً تَنَصَّرَ فِي الجَاهِلِيَّةِ، وَكَانَ يَكْتُبُ الكِتَابَ العِبْرَانِيَّ، فَيَكْتُبُ مِنَ الإِنْجِيلِ بِالعِبْرَانِيَّةِ مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ يَكْتُبَ، وَكَانَ شَيْخًا كَبِيرًا قَدْ عَمِيَ، فَقَالَتْ لَهُ خَدِيجَةُ: يَا ابْنَ عَمِّ، اسْمَعْ مِنَ ابْنِ أَخِيكَ، فَقَالَ لَهُ وَرَقَةُ: يَا ابْنَ أَخِي مَاذَا تَرَى؟ فَأَخْبَرَهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَبَرَ مَا رَأَى، فَقَالَ لَهُ وَرَقَةُ: هَذَا النَّامُوسُ الَّذِي نَزَّلَ اللَّهُ عَلَى مُوسَى، يَا لَيْتَنِي فِيهَا جَذَعًا، لَيْتَنِي أَكُونُ حَيًّا إِذْ يُخْرِجُكَ قَوْمُكَ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَوَ مُخْرِجِيَّ هُمْ»، قَالَ: نَعَمْ، لَمْ يَأْتِ رَجُلٌ قَطُّ بِمِثْلِ مَا جِئْتَ بِهِ إِلَّا عُودِيَ، وَإِنْ يُدْرِكْنِي يَوْمُكَ أَنْصُرْكَ نَصْرًا مُؤَزَّرًا. ثُمَّ لَمْ يَنْشَبْ وَرَقَةُ أَنْ تُوُفِّيَ، وَفَتَرَ الوَحْيُ


3) उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर वही की शुरुआत सच्चे ख़्वाबो की सूरत में हुई l आप जो कुछ ख़्वाब में देखते वह सुबह की रौशनी की तरह सही और सच्चा साबित होता l फिर आपको तन्हाई पसंद हो गयी और आपने ग़ारे हिरा में रहना शुरू कर दिया और कई कई रात घर तशरीफ़ लाये बिना इबादत में मसरूफ़ (व्यस्त) रहते l आप खाने पीने का सामान घर से ले जाकर वहां कुछ दिन गुज़ारते, फिर हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा के पास वापस आते और तक़रीबन इतने ही दिनों के लिए फिर कुछ खाने को ले जाते l एक दिन जब आप ग़ारे हिरा में थे, आपके पास हक़ आ गया और एक फ़रिशते ने आकर आपसे कहा: पढ़ो! आपने फ़रमाया: “मैंने पढ़ा हुआ नहीं हूँ l” आप फ़रमाते हैं कि फ़रिशते ने मुझे पकड़ कर इतने ज़ोर से दबाया कि मेरी ताक़त जवाब दे गयी, फिर उसने मुझे छोड़ दिया और कहा: पढ़ो! मैंने कहा: “मैं तो पढ़ा हुआ नहीं हूँ l” उसने दोबारा मुझे पकड़ कर दबाया कि मेरी ताक़त जवाब देने लगी, फिर छोड़ कर कहा: पढ़ो! मैंने फिर कहा: “मैंने पढ़ा हुआ नहीं हूँ l” उसने तीसरी बार मुझे पकड़ कर दबाया, फिर छोड़ कर कहा: “पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया, जिसने इन्सान को ख़ून के लोथड़े से पैदा किया, पढ़ो! और तुम्हारा रब तो निहायत करीम है l” फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इन आयतों को लेकर वापस आये और आपका दिल (डर से) धड़क रहा था, आप हज़रत ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद रज़ियल्लाहू अन्हा के पास तशरीफ़ लाये और फ़रमाया: “मुझे चादर उढ़ा दो, मुझे चादर उढ़ा दो l” उन्होंने आपको चादर उढ़ा दी, जब आपका डर दूर हुआ तो आपने हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा को पूरा वाक़िया बताते हुए फ़रमाया: “मुझे अपनी जान का डर है l” हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा ने कहा: हरगिज़ नहीं, अल्लाह की क़सम! अल्लाह तआला आपको कभी भी रंजीदा नहीं करेगा l आप सिला रहमी करते हैं, बेकसों का भोज उठाते हैं, फ़क़ीरों, मोहताजो को कमा कर देते हैं, मेहमानों की मेहमान नवाज़ी करते हैं और हक़ के सिलसिले में आने वाली मुसीबतों में मदद करते हैं, फिर हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को साथ ले कर अपने चचा ज़ाद भाई वर्क़ा बिन नौफ़ल बिन असद बिन अब्दुल उज्ज़ा के पास आयीं l वर्क़ा दौरे जाहिलियत में इसाई हो गए थे और इबरानी ज़बान भी लिखना जानते थे और इबरानी ज़बान में अल्लाह की तौफ़ीक़ से इंजील लिखते थे l इस वक़्त बहुत बूढ़े और नाबीना (आँखों से मोहताज) हो चुके थे l उनसे हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा ने कहा: भाई जान! अपने भतीजे की बात सुनें, वर्क़ा ने पूछा: भतीजे क्या देखते हो? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो कुछ देखा था, बयान फ़रमा दिया l इस पर वर्क़ा ने आपसे कहा: यह तो वही नामूस (बाइज्ज़त फ़रिश्ता) है जिसे अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल फ़रमाया था l काश! मैं आपके ज़माने नुबुवत में ताक़तवर होता, काश! मैं उस वक़्त जिंदा रहूँ जब आपकी क़ौम आपको निकाल देगी l रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अच्छा तो क्या वह लोग मुझे निकाल देंगे?” वर्क़ा ने कहा: हाँ! जब भी कोई आदमी इस तरह का पैग़ाम लाया जैसा आप लाये हैं तो उससे ज़रूर दुशमनी की गयी, और अगर मुझे आपका ज़माना मिला तो आपकी भरपूर मदद करूंगा l इसके बाद वर्क़ा जल्द ही इन्तिकाल कर गए फिर कुछ दिनों तक वही का सिलसिला रुक गया l

तख़रीज : सहीह मुस्लिम (403), तिरमिज़ी (3632)


1 الطَّهَارَةِ عَنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ किताब : तहारत के अहकाम ओ मसाइल


بَابُ مَا جَاءَ لاَ تُقْبَلُ صَلاَةٌ بِغَيْرِ طُهُورٍ

बाब 1 :- वुज़ू (तहारत) के बिना नमाज़ क़ुबूल न होने का बयान


٢) حَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ مُوسَى الْأَنْصَارِيُّ قَالَ: حَدَّثَنَا مَعْنُ بْنُ عِيسَى الْقَزَّازُ  قَالَ: حَدَّثَنَا مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ، ح وحَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ سُهَيْلِ بْنِ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِذَا تَوَضَّأَ الْعَبْدُ الْمُسْلِمُ، أَوِ الْمُؤْمِنُ، فَغَسَلَ وَجْهَهُ خَرَجَتْ مِنْ وَجْهِهِ كُلُّ خَطِيئَةٍ نَظَرَ إِلَيْهَا بِعَيْنَيْهِ مَعَ الْمَاءِ - أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ، أَوْ نَحْوَ هَذَا - وَإِذَا غَسَلَ يَدَيْهِ خَرَجَتْ مِنْ يَدَيْهِ كُلُّ خَطِيئَةٍ بَطَشَتْهَا يَدَاهُ مَعَ الْمَاءِ - أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ - حَتَّى يَخْرُجَ نَقِيًّا مِنَ الذُّنُوبِ». هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَهُوَ حَدِيثُ مَالِكٍ، عَنْ سُهَيْلٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، وَأَبُو صَالِحٍ وَالِدُ سُهَيْلٍ هُوَ أَبُو صَالِحٍ السَّمَّانُ، وَاسْمُهُ ذَكْوَانُ، وَأَبُو هُرَيْرَةَ اخْتُلِفَ فِي اسْمِهِ، فَقَالُوا: عَبْدُ شَمْسٍ، وَقَالُوا: عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرٍو، وَهَكَذَا قَالَ مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، وَهَذَا الْأَصَحُّ. وَفِي الْبَابِ عَنْ عُثْمَانَ، وَثَوْبَانَ، وَالصُّنَابِحِيِّ، وَعَمْرِو بْنِ عَبَسَةَ، وَسَلْمَانَ، وَعَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو،  وَالصُّنَابِحِيُّ هَذَا الَّذِي رَوَى عَنْ أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ، لَيْسَ لَهُ سَمَاعٌ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَاسْمُهُ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عُسَيْلَةَ، وَيُكْنَى أَبَا عَبْدِ اللَّهِ، رَحَلَ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقُبِضَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ فِي الطَّرِيقِ، وَقَدْ رَوَى عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَحَادِيثَ، وَالصُّنَابِحُ بْنُ الْأَعْسَرِ الْأَحْمَسِيُّ صَاحِبُ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، يُقَالُ لَهُ: الصُّنَابِحِيُّ أَيْضًا، وَإِنَّمَا حَدِيثُهُ قَالَ: سَمِعْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، يَقُولُ: إِنِّي مُكَاثِرٌ بِكُمُ الْأُمَمَ فَلَا تَقْتَتِلُنَّ بَعْدِي


2) अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जब मुसलमान या मोमिन बन्दा वुज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है तो पानी के साथ या पानी की आख़िरी बूंद के साथ उसके चेहरे से वह सारे गुनाह झड़ जाते हैं, जो उसकी आँखों ने किये थे या इसी तरह की कोई और बात फ़रमाई, फिर जब वह अपने हाथों को धोता है तो पानी के साथ या पानी की आख़िरी बूंद के साथ वह सारे गुनाह झड़ जाते हैं जो उसके हाथों से हुए हैं, और वह गुनाहों से पाक और साफ़ हो कर निकलता है l”इमाम तिरमिज़ी कहते हैं: यह हदीस हसन सहीह है l
यह हदीस मालिक की सुहेल से वो अपनी वालिद से वो अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से और अबू सालेह (इस हदीस का रावी) जो सुहेल के वालिद हैं, अबू सालेह सम्मान है इनका नाम ज़कवान है और अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु के नाम में इख्तिलाफ है, वह कहते हैं इनका नाम अब्दुल शम्श है और वह कहते हैं इनका नाम अब्दुल्लाह बिन अम्र था, यही मुहम्मद बिन इस्माईल (बुख़ारी) कहते हैं और यही बात सबसे सही है l
इस बाब में उस्मान बिन अफ्फ़ान, सौबान, सुनाबिही, अम्र बिन अबसा, सलमान और अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहू अन्हुम से भी हदीसें आयीं हैं lसुनाबिही जिन्होंने अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत की है, उनका समा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नहीं है, उनका नाम अब्दुर रहमान बिन उसैला और कुनियत अबू अब्दुल्लाह है l उनहोंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि के साथ सफ़र किया और रास्ते ही में थे कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि का इन्तिक़ाल हो गया, उन्होंने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कई हदीसें रिवायत की हैं और सुनाबिहू बिन आसर अहमसी सहाबी ए रसूल हैं, उनको भी सुनाहिबी कहा जाता है, उन्हीं की हदीस है कि मैंने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते सुना: “मैं तुम्हारे ज़रिये से दूसरी उम्मतों में अपने ज़्यादा होने पर फ़ख्र करूंगा तो मेरे बाद तुम हरगिज़ एक दुसरे को क़त्ल ना करना l”

तख़रीज : सहीह मुस्लिम(577)
तहकीम :ज़ुबैर अली ज़ई:- सहीह
        शेख़ अलबानी:- सहीह
        शुऐब अरनऊत:- सहीह

Friday, October 11, 2019

1 - كِتَابُ الْإِيمَانَ ईमान के अहकाम व मसाइल

باب بيان الإيمان والإسلام والإحسان ووجوب الإيمان بإثبات قدر الله سبحانه وتعالى وبيان الدليل على التبري ممن لا يؤمن بالقدر وإغلاظ القول في حقه

बाब 1: ईमान, इस्लाम, इहसान की वज़ाहत, तक़दीरे इलाही के अस्बात पर ईमान वाजिब है, तक़दीर पर ईमान न लाने वाले से बरात की दलील और उसके बारे में सख़्त मौक़िफ़

[٩٣] حَدَّثَنِي أَبُو خَيْثَمَةَ زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ كَهْمَسٍ، عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، ح وحَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللهِ بْنُ مُعَاذٍ الْعَنْبَرِيُّ - وَهَذَا حَدِيثُهُ - حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا كَهْمَسٌ، عَنِ ابْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، قَالَ: كَانَ أَوَّلَ مَنْ قَالَ فِي الْقَدَرِ بِالْبَصْرَةِ مَعْبَدٌ الْجُهَنِيُّ، فَانْطَلَقْتُ أَنَا وَحُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْحِمْيَرِيُّ حَاجَّيْنِ - أَوْ مُعْتَمِرَيْنِ - فَقُلْنَا: لَوْ لَقِينَا أَحَدًا مَنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَسَأَلْنَاهُ عَمَّا يَقُولُ هَؤُلَاءِ فِي الْقَدَرِ، فَوُفِّقَ لَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ دَاخِلًا الْمَسْجِدَ، فَاكْتَنَفْتُهُ أَنَا وَصَاحِبِي أَحَدُنَا عَنْ يَمِينِهِ، وَالْآخَرُ عَنْ شِمَالِهِ، فَظَنَنْتُ أَنَّ صَاحِبِي سَيَكِلُ الْكَلَامَ إِلَيَّ، فَقُلْتُ: أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ إِنَّهُ قَدْ ظَهَرَ قِبَلَنَا نَاسٌ يَقْرَءُونَ الْقُرْآنَ، وَيَتَقَفَّرُونَ الْعِلْمَ، وَذَكَرَ مِنْ شَأْنِهِمْ، وَأَنَّهُمْ يَزْعُمُونَ أَنْ لَا قَدَرَ، وَأَنَّ الْأَمْرَ أُنُفٌ، قَالَ: «فَإِذَا لَقِيتَ أُولَئِكَ فَأَخْبِرْهُمْ أَنِّي بَرِيءٌ مِنْهُمْ، وَأَنَّهُمْ بُرَآءُ مِنِّي»، وَالَّذِي يَحْلِفُ بِهِ عَبْدُ اللهِ بْنُ عُمَرَ «لَوْ أَنَّ لِأَحَدِهِمْ مِثْلَ أُحُدٍ ذَهَبًا، فَأَنْفَقَهُ مَا قَبِلَ اللهُ مِنْهُ حَتَّى يُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ» ثُمَّ قَالَ: حَدَّثَنِي أَبِي عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ قَالَ: بَيْنَمَا نَحْنُ عِنْدَ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ذَاتَ يَوْمٍ، إِذْ طَلَعَ عَلَيْنَا رَجُلٌ شَدِيدُ بَيَاضِ الثِّيَابِ، شَدِيدُ سَوَادِ الشَّعَرِ، لَا يُرَى عَلَيْهِ أَثَرُ السَّفَرِ، وَلَا يَعْرِفُهُ مِنَّا أَحَدٌ، حَتَّى جَلَسَ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَأَسْنَدَ رُكْبَتَيْهِ إِلَى رُكْبَتَيْهِ، وَوَضَعَ كَفَّيْهِ عَلَى فَخِذَيْهِ، وَقَالَ: يَا مُحَمَّدُ أَخْبِرْنِي عَنِ الْإِسْلَامِ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «الْإِسْلَامُ أَنْ تَشْهَدَ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَتُقِيمَ الصَّلَاةَ، وَتُؤْتِيَ الزَّكَاةَ، وَتَصُومَ رَمَضَانَ، وَتَحُجَّ الْبَيْتَ إِنِ اسْتَطَعْتَ إِلَيْهِ سَبِيلًا»، قَالَ: صَدَقْتَ، قَالَ: فَعَجِبْنَا لَهُ يَسْأَلُهُ، وَيُصَدِّقُهُ، قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنِ الْإِيمَانِ، قَالَ: «أَنْ تُؤْمِنَ بِاللهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَالْيَوْمِ الْآخِرِ، وَتُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ»، قَالَ: صَدَقْتَ، قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنِ الْإِحْسَانِ، قَالَ: «أَنْ تَعْبُدَ اللهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ، فَإِنْ لَمْ تَكُنْ تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ»، قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنِ السَّاعَةِ، قَالَ: «مَا الْمَسْئُولُ عَنْهَا بِأَعْلَمَ مِنَ السَّائِلِ» قَالَ: فَأَخْبِرْنِي عَنْ أَمَارَتِهَا، قَالَ: «أَنْ تَلِدَ الْأَمَةُ رَبَّتَهَا، وَأَنْ تَرَى الْحُفَاةَ الْعُرَاةَ الْعَالَةَ رِعَاءَ الشَّاءِ يَتَطَاوَلُونَ فِي الْبُنْيَانِ»، قَالَ: ثُمَّ انْطَلَقَ فَلَبِثْتُ مَلِيًّا، ثُمَّ قَالَ لِي: «يَا عُمَرُ أَتَدْرِي مَنِ السَّائِلُ؟» قُلْتُ: اللهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ، قَالَ: «فَإِنَّهُ جِبْرِيلُ أَتَاكُمْ يُعَلِّمُكُمْ دِينَكُمْ»

93) इब्ने बुरैदा ने यहया बिन यामर से रिवायत की, उन्होंने कहा कि सबसे पहला शख़्स जिसने बसरा में तक़दीर (से इन्कार) की बात की, मअबद जुहनी था l मैं (यहया) और हुमैद बिन अब्दुर रहमान हिमयरी हज या उमरे कि इरादे से निकले, हमने (आपस में) कहा: काश! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि के सहाबा में से किसी के साथ हमारी मुलाक़ात हो जाये तो हम उनसे तक़दीर के बारे में इन (आजकल के) लोगो की कही हुई बातों के बारे में पूँछ लें l अल्लाह की तौफीक़ से हमें हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहू अन्हुमा मस्जिद में जाते हुए मिल गये l मैं और मेरे साथी ने उनको अपने बीच में ले लिया, एक उनकी दायीं तरफ़ था और दूसरा उनकी बायीं तरफ़ l मुझे अंदाजा था कि मेरा साथी बात करने (का मामला) मेरे ही सुपुर्द करेगा, तो मैंने पूछा: ऐ अबू अब्दुर रहमान! (यह अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा की कुनियत है) बात यह है कि हमारी तरफ़ कुछ ऐसे लोग आये हैं जो क़ुरआन मजीद पढ़ते हैं और इल्म सीखते हैं (और उनके हालात बयान किये) उन लोगो का ख़याल है कि तक़दीर कुछ नहीं, (हर) काम नए सिरे से हो रहा है (पहले इस बारे में न कुछ तय है, न अल्लाह को इसका इल्म है) इब्ने उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा ने फ़रमाया: जब तुम्हारी उन लोगो से मुलाक़ात हो तो उन्हें बता देना कि मैं उनसे बरी हूँ और वह मुझसे बरी हैं l उस (ज़ात) की क़सम जिस (के नाम) के साथ अब्दुल्लाह बिन उमर हलफ़ उठाता है! अगर उनमें से किसी के पास उहुद पहाड़ के बराबर सोना हो और वह उसे ख़र्च (भी) कर दे तो अल्लाह तआला उसकी तरफ़ से उसको क़ुबूल नहीं फ़रमायेगा जब तक कि वह तक़दीर पर ईमान ले आये, फिर कहा: मुझे मेरे वालिद हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहू अन्हु ने बताया: एक दिन हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास हाज़िर थे कि अचानक एक शख़्स हमारे सामने आया l उसके कपड़े बहुत ज़्यादा सफ़ेद और बाल बहुत ज़्यादा काले थे l उसपर सफ़र का कोई असर दिखाई नहीं देता न हममें से कोई उसे पहचानता था, वह आकर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास बैठ गया और अपने घुटने आपके घुटनों से मिला दिए, और अपने हाथ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रानों पर रख दिए और कहा: ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! मुझे इस्लाम के बारे में बताइए l रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “इस्लाम यह है कि तुम इस बात की गवाही दो कि अल्लाह तआला के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके रसूल हैं, नमाज़ पाबन्दी से पढ़ो, ज़कात अदा करो, रमज़ान के रोज़े रखो और अगर अल्लाह के घर तक रास्ता (तय करने) की ताक़त हो तो उसका हज करो l” उसने कहा: आपने सच फ़रमाया l (हज़रत उमर रज़ियल्लाहू ने) कहा: हमें इस पर हैरानी हुई कि आपसे पूछता है और (ख़ुद ही) आपकी तस्दीक़ करता है l उसने कहा: मुझे ईमान के बारे में बताइए l आपने फ़रमाया: “यह कि तुम अल्लाह तआला, उसके फ़रिशतों, उसकी किताबों, उसके रसूलों और आख़िरी दिन (क़यामत के दिन) पर ईमान रखो और अच्छी और बुरी तक़दीर पर भी ईमान लाओ l” उसने कहा: आपने दुरुस्त फ़रमाया l (फिर) उसने कहा: मुझे इहसान के बारे में बताइए l आपने फ़रमाया: “यह कि तुम अल्लाह तआला की इबादत इस तरह करो जैसे तुम उसे देख रहे हो और अगर तुम उसे नहीं देख रहे हो तो वह तुम्हें देख रहा है l” उसने कहा: तो मुझे क़यामत के बारे में बताइए l आपने फ़रमाया: “जिससे इस (क़यामत) के बारे में सवाल किया जा रहा है, वह पूछने वाले से ज़्यादा नहीं जानता l” उसने कहा: तो मुझे इसकी निशानियाँ बता दीजिये l आपने फ़रमाया: “(निशानियाँ यह हैं कि) लौंडी अपनी मालिका को जन्म दे और यह कि तुम नंगे पांव, नंगे बदन, मोहताज, बकरियां चराने वालों को देखो कि वह ऊंची से ऊंची इमारतें बनाने में एक दुसरे के साथ मुक़ाबला कर रहे हैं l” हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा: फिर वह पूछने वाला चला गया, मैंने कुछ देर इसी तरह रहा, फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझ से कहा: “ऐ उमर! तुम्हें मालूम है कि पूछने वाला कौन था?” मैंने कहा: अल्लाह और उसका रसूल ज़्यादा जानता हैं l आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “वह जिब्रील अलैहिस्सलाम थे, तुम्हारे पास आये थे, तुम्हें तुम्हारा दीन सिखा रहे थे l”

तख़रीज : सुनन अबू दावूद (4695), सुनन इब्ने माजा (63)  


[٩٤] حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ الْغُبَرِيُّ، وَأَبُو كَامِلٍ الْجَحْدَرِيُّ، وَأَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ قَالُوا: حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ مَطَرٍ الْوَرَّاقِ، عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، قَالَ: لَمَّا تَكَلَّمَ مَعْبَدٌ بِمَا تَكَلَّمَ بِهِ فِي شَأْنِ الْقَدَرِ أَنْكَرْنَا ذَلِكَ، قَالَ: فَحَجَجْتُ أَنَا وَحُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْحِمْيَرِيُّ حَجَّةً، وَسَاقُوا الْحَدِيثَ بِمَعْنَى حَدِيثِ كَهْمَسٍ وَإِسْنَادِهِ، وَفِيهِ بَعْضُ زِيَادَةٍ وَنُقْصَانُ أَحْرُفٍ

94) कहमस के बजाये मतर वर्राक़ ने अब्दुल्लाह बिन बुरैदा से, उन्होंने यहया बिन यामर से नक़ल किया कि जब माबद ने तक़दीर के बारे में वह (सब) कहा जो कहा, तो हमने उसे बहुत बुरा जाना (यहया ने कहा) मैंने और हुमैद बिन अब्दुर रहमान हिमयरी ने हज किया...... इसके बाद उन्होंने कहमस के वास्ते से बयान की हुई  हदीस के मुताबिक़ हदीस बयान की, अलबत्ता अलफ़ाज़ में कुछ कमी बेशी है l

तख़रीज : सुनन अबू दावूद (4695), सुनन इब्ने माजा (63) 


[٩٥] وحَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ حَاتِمٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ غِيَاثٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ بُرَيْدَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، وَحُمَيْدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ قَالَا: لَقِينَا عَبْدَ اللهِ بْنَ عُمَرَ، فَذَكَرْنَا الْقَدَرَ، وَمَا يَقُولُونَ فِيهِ، فَاقْتَصَّ الْحَدِيثَ كَنَحْوِ حَدِيثِهِمْ، عَنْ عُمَرَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَفِيهِ شَيْءٌ مِنْ زِيَادَةٍ وَقَدْ نَقَصَ مِنْهُ شَيْئًا

95) (अब्दुल्लाह बिन बुरैदा के एक तीसरे शागिर्द) उस्मान बिन ग़ियास ने यहया बिन यामर और हुमैद बिन अब्दुर रहमान दोनों से रिवायत की, दोनों ने कहा: हम अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा से मिले और हमने तक़दीर की बात की और वह लोग जो कुछ कहते हैं, उसका ज़िक्र किया l इसके बाद (उस्मान बिन ग़ियास ने) पहले रावियों के मुताबिक़ हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु से मरफ़ूअन रिवायत की l इस रिवायत में कुछ अलफ़ाज़ ज़्यादा हैं और कुछ उन्होंने कम किये हैं l

तख़रीज : सुनन अबू दावूद (4695), सुनन इब्ने माजा (63) 


[٩٦] وحَدَّثَنِي حَجَّاجُ بْنُ الشَّاعِرِ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا الْمُعْتَمِرُ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنْ عُمَرَ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِنَحْوِ حَدِيثِهِمْ


96) मुअतमिर के वालिद (सुलेमान बिन तरख़ान) ने यहया बिन यामर से, उन्होंने अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा से, उन्होंने हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु से और उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इसी तरह रिवायत की जिस तरह इससे पहले ज़िक्र किये हुए उस्तादों ने रिवायत की l

तख़रीज : सुनन अबू दावूद (4695), सुनन इब्ने माजा (63) 

Thursday, October 10, 2019

بَدْءِ الوَحْيِ वही की शुरुआत का बयान

كَيْفَ كَانَ بَدْءُ الوَحْيِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟ وَقَوْلُ اللَّهِ جَلَّ ذِكْرُهُ: {إِنَّا أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ كَمَا أَوْحَيْنَا إِلَى نُوحٍ وَالنَّبِيِّينَ مِنْ بَعْدِهِ} [النساء: 163]

बाब 1: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर वही की शुरआत कैसे हुई? अल्लाह तआला के फ़रमान (की वज़ाहत) : "हमने आपकी तरफ़ उसी तरह वही नाज़िल फ़रमाई है जैसे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनके बाद आने वाले सारे नबियों की तरफ़ नाज़िल की थी"


٢) حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يُوسُفَ، قَالَ: أَخْبَرَنَا مَالِكٌ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنِينَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، أَنَّ الحَارِثَ بْنَ هِشَامٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ سَأَلَ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، كَيْفَ يَأْتِيكَ الوَحْيُ؟ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: أَحْيَانًا يَأْتِينِي مِثْلَ صَلْصَلَةِ الجَرَسِ، وَهُوَ أَشَدُّهُ عَلَيَّ، فَيُفْصَمُ عَنِّي وَقَدْ وَعَيْتُ عَنْهُ مَا قَالَ، وَأَحْيَانًا يَتَمَثَّلُ لِيَ المَلَكُ رَجُلًا فَيُكَلِّمُنِي فَأَعِي مَا يَقُولُ قَالَتْ عَائِشَةُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا: وَلَقَدْ رَأَيْتُهُ يَنْزِلُ عَلَيْهِ الوَحْيُ فِي اليَوْمِ الشَّدِيدِ البَرْدِ، فَيَفْصِمُ عَنْهُ وَإِنَّ جَبِينَهُ لَيَتَفَصَّدُ عَرَقًا


2) उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा से रिवायत है कि हज़रत हारिस बिन हिशाम रज़ियल्लाहू अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा” ऐ अल्लाह के रसूल! आप पर वही कैसे आती है? तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “कभी तो वही आने की कैफ़ियत घंटी की टन टन की तरह होती है और यह कैफ़ियत मुझ पर बहुत सख़् गुज़रती, फ़िर जब फ़रिशते का पैग़ाम मुझे याद हो जाता है तो यह रुक जाती है और कभी फ़रिशता इंसानी शक्ल में मेरे पास आकर मुझसे बात करता और जो कुछ वह कहता है मैं उसे याद कर लेता हूँ l” हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा का बयान है: मैंने सख़्त सर्दी के दिनों में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि जब वही आती तो उसके रुक जाने के बाद आपके माथे पर पसीना बह रहा होता l



तख़रीज : सहीह मुस्लिम (6058,6059), तिरमिज़ी (3634), नसाई (935)

1 كِتَابُ الطَّهَارَةِ तहारत के अहकाम ओ मसाइल

بَابُ السِّوَاكِ إِذَا قَامَ مِنَ اللَّيْلِ

बाब 2 :- जब रात को नींद से उठे तो मिस्वाक करे 

٢) أَخْبَرَنَا إِسْحَاقُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ جَرِيرٍ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ حُذَيْفَةَ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ «إِذَا قَامَ مِنَ اللَّيْلِ يَشُوصُ فَاهُ بِالسِّوَاكِ»

2) हज़रत हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रात को नींद से उठते तो अपने मुंह को मिस्वाक से साफ़ करते थे l

तख़रीज : सही बुख़ारी (245), सही मुस्लिम (595), सुनन अबू दावूद (55)इब्ने माजा (286)

  مُقَدّمَة                                                                                    मुक़दमा    ١) عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَض...