Hadees in hindi

Saturday, October 26, 2019

1 - كِتَابُ الْإِيمَانَ ईमान के अहकाम व मसाइल

الإسلام مَا هُوَ وَبَيَانُ خِصَالِهِ

इस्लाम की हक़ीक़त और उसकी ख़ूबियाँ


٩٩) حَدَّثَنِي زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ عُمَارَةَ وَهُوَ ابْنُ الْقَعْقَاعِ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «سَلُونِي»، فَهَابُوهُ أَنْ يَسْأَلُوهُ، فَجَاءَ رَجُلٌ، فَجَلَسَ عِنْدَ رُكْبَتَيْهِ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِسْلَامُ؟ قَالَ: «لَا تُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا، وَتُقِيمُ الصَّلَاةَ، وَتُؤْتِي الزَّكَاةَ، وَتَصُومُ رَمَضَانَ»، قَالَ: صَدَقْتَ، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِيمَانُ؟ قَالَ: «أَنْ تُؤْمِنَ بِاللهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكِتَابِهِ، وَلِقَائِهِ، وَرُسُلِهِ، وَتُؤْمِنَ بِالْبَعْثِ، وَتُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ كُلِّهِ»، قَالَ: صَدَقْتَ، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْإِحْسَانُ؟ قَالَ: «أَنْ تَخْشَى اللهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ، فَإِنَّكَ إِنْ لَا تَكُنْ تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ»، قَالَ: صَدَقْتَ. قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَتَى تَقُومُ السَّاعَةُ؟ قَالَ: " مَا الْمَسْئُولُ عَنْهَا بِأَعْلَمَ مِنَ السَّائِلِ، وَسَأُحَدِّثُكَ عَنْ أَشْرَاطِهَا: إِذَا رَأَيْتَ الْمَرْأَةَ تَلِدُ رَبَّهَا، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا، وَإِذَا رَأَيْتَ الْحُفَاةَ الْعُرَاةَ الصُّمَّ الْبُكْمَ مُلُوكَ الْأَرْضِ، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا، وَإِذَا رَأَيْتَ رِعَاءَ الْبَهْمِ يَتَطَاوَلُونَ فِي الْبُنْيَانِ، فَذَاكَ مِنْ أَشْرَاطِهَا فِي خَمْسٍ مِنَ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهُنَّ إِلَّا اللهُ "، ثُمَّ قَرَأَ: {إِنَّ اللهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللهِ عَلِيمٌ خَبِيرٌ} [لقمان: 34] قَالَ: ثُمَّ قَامَ الرَّجُلُ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «رُدُّوهُ عَلَيَّ»، فَالْتُمِسَ، فَلَمْ يَجِدُوهُ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «هَذَا جِبْرِيلُ، أَرَادَ أَنْ تَعَلَّمُوا إِذْ لَمْ تَسْأَلُوا»


99) हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “मुझसे (दीन के बारे में) पूछ लो l” सहाबा किराम आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हैबत की वजह से पूछ न सके, तब एक आदमी आया और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दोनों घुटनों के क़रीब बैठ गया, फिर कहने लगा: ऐ अल्लाह के रसूल! इस्लाम क्या है? आपने फ़रमाया: “तुम अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक न करो, नमाज़ क़ायम करो, ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखो l” उसने कहा: आपने सच कहा l फिर पुछा: ऐ अल्लाह के रसूल! ईमान क्या है? आपने फ़रमाया: “यह कि तुम अल्लाह तआला, उसके फ़रिशतों, उसकी किताब, (क़यामत के दिन) उससे मुलाक़ात और उसके रसूलों पर ईमान लाओ, मरने के बाद उठने पर ईमान लाओ और तक़दीर पर ईमान लाओ l” उसने कहा: आपने सच कहा l फिर कहने लगा: ऐ अल्लाह के रसूल! इहसान क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “तुम अल्लाह तआला से इस तरह डरो जैसे तुम उसे देख रहे हो और अगर तुम उसे नहीं देख रहे हो तो वह यक़ीनन तुम्हें देख रहा है l” उसने कहा: आपने सच कहा, फिर पुछा: ऐ अल्लाह के रसूल! क़यामत कब होगी? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जिससे क़यामत के बारे में सवाल किया गया है, वह इसके बारे में पूछने वाले से ज़्यादा नहीं जानता, लेकिन मैं तुम्हें क़यामत की निशानियाँ बता देता हूँ: जब औरत अपना मालिक जनेगी तो यह उसकी निशानियों में से है, जब नंगे पैर वाले और नंगे बदन, गूंगे और बहरे ज़मीन के बादशाह हैं तो यह उसकी निशानियों में से है और जब भेड़ बकरियां चराने वाले, ऊंचीं ऊंचीं इमारतें बनाने में एक दुसरे से मुक़ाबला करेंगें तो यह उसकी निशानियों में से है, यह (क़यामत के वक़्त का इल्म) ग़ैब की उन पांच चीज़ों में से है जिन्हें अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता l” फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह आयत पढ़ी: “बेशक अल्लाह तआला ही के पास क़यामत का इल्म है, वही बारिश बरसाता है और वही जानता है कि माओं के पेटों में क्या है, कोई जान नहीं जानती कि वह कल क्या करेगी, न किसी नफ़्स को यह मालूम है कि वह ज़मीन के किस हिस्से में मरेग......l” सूरत के आख़िर तक (हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु ने) कहा: फिर वह आदमी वापस चला गया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “उस आदमी को मेरे पास वापस लाओ l” सहाबा किराम उसे वापस लाने के लिए भाग दौड़ करने लगे तो उन्हें कुछ नज़र न आया, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “यह जिब्रील अलैहिस्सलाम थे जो लोगों को उनका दीन सिखाने आये थे l”

तख़रीज : सही बुख़ारी (50), सुनन अबू दावूद (4698), सुनन नसाई (4994), इब्ने माजा (64)

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  مُقَدّمَة                                                                                    मुक़दमा    ١) عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَض...