Hadees in hindi

Sunday, October 13, 2019

1- بَدْءِ الوَحْيِ वही की शुरुआत का बयान

كَيْفَ كَانَ بَدْءُ الوَحْيِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟ وَقَوْلُ اللَّهِ جَلَّ ذِكْرُهُ: {إِنَّا أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ كَمَا أَوْحَيْنَا إِلَى نُوحٍ وَالنَّبِيِّينَ مِنْ بَعْدِهِ} [النساء: 163]

बाब 1: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर वही की शुरआत कैसे हुई? अल्लाह तआला के फ़रमान (की वज़ाहत) : "हमने आपकी तरफ़ उसी तरह वही नाज़िल फ़रमाई है जैसे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनके बाद आने वाले सारे नबियों की तरफ़ नाज़िल की थी"


٣) حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ بُكَيْرٍ، قَالَ: حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ عُقَيْلٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنِينَ أَنَّهَا قَالَتْ: أَوَّلُ مَا بُدِئَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنَ الوَحْيِ الرُّؤْيَا الصَّالِحَةُ فِي النَّوْمِ، فَكَانَ لاَ يَرَى رُؤْيَا إِلَّا جَاءَتْ مِثْلَ فَلَقِ الصُّبْحِ، ثُمَّ حُبِّبَ إِلَيْهِ الخَلاَءُ، وَكَانَ يَخْلُو بِغَارِ حِرَاءٍ فَيَتَحَنَّثُ فِيهِ - وَهُوَ التَّعَبُّدُ - اللَّيَالِيَ ذَوَاتِ العَدَدِ قَبْلَ أَنْ يَنْزِعَ إِلَى أَهْلِهِ، وَيَتَزَوَّدُ لِذَلِكَ، ثُمَّ يَرْجِعُ إِلَى خَدِيجَةَ فَيَتَزَوَّدُ لِمِثْلِهَا، حَتَّى جَاءَهُ الحَقُّ وَهُوَ فِي غَارِ حِرَاءٍ، فَجَاءَهُ المَلَكُ فَقَالَ: اقْرَأْ، قَالَ: «مَا أَنَا بِقَارِئٍ»، قَالَ: " فَأَخَذَنِي فَغَطَّنِي حَتَّى بَلَغَ مِنِّي الجَهْدَ ثُمَّ أَرْسَلَنِي، فَقَالَ: اقْرَأْ، قُلْتُ: مَا أَنَا بِقَارِئٍ، فَأَخَذَنِي فَغَطَّنِي الثَّانِيَةَ حَتَّى بَلَغَ مِنِّي الجَهْدَ ثُمَّ أَرْسَلَنِي، فَقَالَ: اقْرَأْ، فَقُلْتُ: مَا أَنَا بِقَارِئٍ، فَأَخَذَنِي فَغَطَّنِي الثَّالِثَةَ ثُمَّ أَرْسَلَنِي، فَقَالَ: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ. خَلَقَ الإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ. اقْرَأْ وَرَبُّكَ الأَكْرَمُ} [العلق: 2] " فَرَجَعَ بِهَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَرْجُفُ فُؤَادُهُ، فَدَخَلَ عَلَى خَدِيجَةَ بِنْتِ خُوَيْلِدٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، فَقَالَ: «زَمِّلُونِي زَمِّلُونِي» فَزَمَّلُوهُ حَتَّى ذَهَبَ عَنْهُ الرَّوْعُ، فَقَالَ لِخَدِيجَةَ وَأَخْبَرَهَا الخَبَرَ: «لَقَدْ خَشِيتُ عَلَى نَفْسِي» فَقَالَتْ خَدِيجَةُ: كَلَّا وَاللَّهِ مَا يُخْزِيكَ اللَّهُ أَبَدًا، إِنَّكَ لَتَصِلُ الرَّحِمَ، وَتَحْمِلُ الكَلَّ، وَتَكْسِبُ المَعْدُومَ، وَتَقْرِي الضَّيْفَ، وَتُعِينُ عَلَى نَوَائِبِ الحَقِّ، فَانْطَلَقَتْ بِهِ خَدِيجَةُ حَتَّى أَتَتْ بِهِ وَرَقَةَ بْنَ نَوْفَلِ بْنِ أَسَدِ بْنِ عَبْدِ العُزَّى ابْنَ عَمِّ خَدِيجَةَ وَكَانَ امْرَأً تَنَصَّرَ فِي الجَاهِلِيَّةِ، وَكَانَ يَكْتُبُ الكِتَابَ العِبْرَانِيَّ، فَيَكْتُبُ مِنَ الإِنْجِيلِ بِالعِبْرَانِيَّةِ مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ يَكْتُبَ، وَكَانَ شَيْخًا كَبِيرًا قَدْ عَمِيَ، فَقَالَتْ لَهُ خَدِيجَةُ: يَا ابْنَ عَمِّ، اسْمَعْ مِنَ ابْنِ أَخِيكَ، فَقَالَ لَهُ وَرَقَةُ: يَا ابْنَ أَخِي مَاذَا تَرَى؟ فَأَخْبَرَهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَبَرَ مَا رَأَى، فَقَالَ لَهُ وَرَقَةُ: هَذَا النَّامُوسُ الَّذِي نَزَّلَ اللَّهُ عَلَى مُوسَى، يَا لَيْتَنِي فِيهَا جَذَعًا، لَيْتَنِي أَكُونُ حَيًّا إِذْ يُخْرِجُكَ قَوْمُكَ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَوَ مُخْرِجِيَّ هُمْ»، قَالَ: نَعَمْ، لَمْ يَأْتِ رَجُلٌ قَطُّ بِمِثْلِ مَا جِئْتَ بِهِ إِلَّا عُودِيَ، وَإِنْ يُدْرِكْنِي يَوْمُكَ أَنْصُرْكَ نَصْرًا مُؤَزَّرًا. ثُمَّ لَمْ يَنْشَبْ وَرَقَةُ أَنْ تُوُفِّيَ، وَفَتَرَ الوَحْيُ


3) उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर वही की शुरुआत सच्चे ख़्वाबो की सूरत में हुई l आप जो कुछ ख़्वाब में देखते वह सुबह की रौशनी की तरह सही और सच्चा साबित होता l फिर आपको तन्हाई पसंद हो गयी और आपने ग़ारे हिरा में रहना शुरू कर दिया और कई कई रात घर तशरीफ़ लाये बिना इबादत में मसरूफ़ (व्यस्त) रहते l आप खाने पीने का सामान घर से ले जाकर वहां कुछ दिन गुज़ारते, फिर हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा के पास वापस आते और तक़रीबन इतने ही दिनों के लिए फिर कुछ खाने को ले जाते l एक दिन जब आप ग़ारे हिरा में थे, आपके पास हक़ आ गया और एक फ़रिशते ने आकर आपसे कहा: पढ़ो! आपने फ़रमाया: “मैंने पढ़ा हुआ नहीं हूँ l” आप फ़रमाते हैं कि फ़रिशते ने मुझे पकड़ कर इतने ज़ोर से दबाया कि मेरी ताक़त जवाब दे गयी, फिर उसने मुझे छोड़ दिया और कहा: पढ़ो! मैंने कहा: “मैं तो पढ़ा हुआ नहीं हूँ l” उसने दोबारा मुझे पकड़ कर दबाया कि मेरी ताक़त जवाब देने लगी, फिर छोड़ कर कहा: पढ़ो! मैंने फिर कहा: “मैंने पढ़ा हुआ नहीं हूँ l” उसने तीसरी बार मुझे पकड़ कर दबाया, फिर छोड़ कर कहा: “पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया, जिसने इन्सान को ख़ून के लोथड़े से पैदा किया, पढ़ो! और तुम्हारा रब तो निहायत करीम है l” फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इन आयतों को लेकर वापस आये और आपका दिल (डर से) धड़क रहा था, आप हज़रत ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद रज़ियल्लाहू अन्हा के पास तशरीफ़ लाये और फ़रमाया: “मुझे चादर उढ़ा दो, मुझे चादर उढ़ा दो l” उन्होंने आपको चादर उढ़ा दी, जब आपका डर दूर हुआ तो आपने हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा को पूरा वाक़िया बताते हुए फ़रमाया: “मुझे अपनी जान का डर है l” हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा ने कहा: हरगिज़ नहीं, अल्लाह की क़सम! अल्लाह तआला आपको कभी भी रंजीदा नहीं करेगा l आप सिला रहमी करते हैं, बेकसों का भोज उठाते हैं, फ़क़ीरों, मोहताजो को कमा कर देते हैं, मेहमानों की मेहमान नवाज़ी करते हैं और हक़ के सिलसिले में आने वाली मुसीबतों में मदद करते हैं, फिर हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को साथ ले कर अपने चचा ज़ाद भाई वर्क़ा बिन नौफ़ल बिन असद बिन अब्दुल उज्ज़ा के पास आयीं l वर्क़ा दौरे जाहिलियत में इसाई हो गए थे और इबरानी ज़बान भी लिखना जानते थे और इबरानी ज़बान में अल्लाह की तौफ़ीक़ से इंजील लिखते थे l इस वक़्त बहुत बूढ़े और नाबीना (आँखों से मोहताज) हो चुके थे l उनसे हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहू अन्हा ने कहा: भाई जान! अपने भतीजे की बात सुनें, वर्क़ा ने पूछा: भतीजे क्या देखते हो? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो कुछ देखा था, बयान फ़रमा दिया l इस पर वर्क़ा ने आपसे कहा: यह तो वही नामूस (बाइज्ज़त फ़रिश्ता) है जिसे अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल फ़रमाया था l काश! मैं आपके ज़माने नुबुवत में ताक़तवर होता, काश! मैं उस वक़्त जिंदा रहूँ जब आपकी क़ौम आपको निकाल देगी l रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अच्छा तो क्या वह लोग मुझे निकाल देंगे?” वर्क़ा ने कहा: हाँ! जब भी कोई आदमी इस तरह का पैग़ाम लाया जैसा आप लाये हैं तो उससे ज़रूर दुशमनी की गयी, और अगर मुझे आपका ज़माना मिला तो आपकी भरपूर मदद करूंगा l इसके बाद वर्क़ा जल्द ही इन्तिकाल कर गए फिर कुछ दिनों तक वही का सिलसिला रुक गया l

तख़रीज : सहीह मुस्लिम (403), तिरमिज़ी (3632)


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